-: हरेला :-
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हरेला त्योहार भारतीय राज्य उत्तराखंड में प्रमुख रूप से मनाया जाता है, खासकर कुमाऊंणी और गढ़वाली समुदायों में। यह एक महत्वपूर्ण कृषि त्योहार है जो देवी "पार्वती" या "हर" की पूजा के लिए समर्पित है, इसीलिए इसे "हरेला" कहा जाता है (हरेला का शब्दार्थ होता है "हरे के दिन")।
हरेला त्योहार का इतिहास:
हरेला का इतिहास प्राचीन कृषि प्रथाओं के विकास से जुड़ा हुआ है। उत्तराखंड एक पहाड़ी क्षेत्र है जिसमें प्रमुख रूप से कृषि अर्थव्यवस्था है, इसलिए स्थानीय खेती करने वाले समुदायों के लिए यह त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है। इसे माना जाता है कि हरेला का जश्न सदियों पहले तक पहुंचता है जब लोग एक सफल फसल के लिए प्रकृति और उसकी धरोहर की पूजा करते थे।
इसे क्यों मनाते हैं:
हरेला का जश्न समय के साथ कृषि प्रक्रिया के आरंभ को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है। यह बरसाती महीनों में होता है जब पहली बूंदें धरती पर नए जीवन को लाती हैं, जिससे उपजाऊ बनाने के लिए ज़मीन उपजाऊ बन जाती है। त्योहार गोदावरी नदी के साथ जुड़े कुमाऊंणी कल्चर और संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
इसके पीछे की कहानी:
हरेला के पीछे की कथा लोकल धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। हालांकि, आम तौर पर यह संबंधित मिथक और इतिहासिक कथा जीवन में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और उत्पादन सेक्टर में खेती के महत्व को प्रमुख बनाती है। यह कहानी आम तौर पर पर्यावरण की संरक्षण और प्रकृति से सजगता की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रशंसा करती है।
हरेला मनाने के लाभ:
1. समुदायिक सम्बन्ध: हरेला लोगों को एकजुट करता है, समुदाय में एकता और सहकारिता की भावना को बढ़ाता है।
2. पर्यावरण संवेदनशीलता: त्योहार पर्यावरण संबंधी जागरूकता को बढ़ाकर प्रायोजक करता है जिससे प्राकृतिक संरक्षण का महत्व समझा जा सकता है।
3. कृषि समृद्धि: फसल की
फलदार उपज के लिए देवी पार्वती की कृपा की अनुप्रार्थना से हरेला खेतीकर्ताओं और कृषि क्षेत्र के कल्याण में मदद करता है।
4. सांस्कृतिक धरोहर: हरेला पारंपरिक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों को संरक्षित रखने में मदद करता है जो क्षेत्रीय हैं।
त्योहार के दौरान गतिविधियाँ:
1. पौधे लगाना: लोग बर्ली या गेहूं के बीज को मिट्टी से भरे हुए छोटे पॉट में बोते हैं, जिन्हें फिर उन्हें नाना पोता पूरा होने तक पालते हैं।
2. पूजा और भेंटें: नए उगे हुए पौधे को मंदिर ले जाया जाता है, जहां देवी पार्वती की पूजा और भेंटें की जाती हैं ताकि उनकी कृपा मिले और एक अच्छी फसल का आशीर्वाद हो।
3. खान-पान और उत्सव: हरेला खुशियों और धमाकेदार उत्सव का समय होता है, जहां लोग परंपरागत संगीत, नृत्य और स्थानीय स्वादिष्ट भोजन के साथ मिलकर मनाते हैं।
भविष्य के प्रभाव:
अगर हरेला त्योहार भविष्य की पीढ़ियों द्वारा जारी रखा जाता है, तो कई सकारात्मक परिणामों का अनुमान लगाया जा सकता है:
1. समृद्ध कृषि: त्योहार की ध्येयवाद खेती के लिए ईको-मित्रशील और स्थायी खेती अनुसंधान को बढ़ावा देने से होगा।
2. पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति की पूजा के जारी रहने से समय के साथ पर्यावरण संरक्षण की भावना भी संस्कृति में बस जाएगी, जिससे एक पर्यावरण संवेदनशील समाज का निर्माण होगा।
3. सांस्कृतिक पहचान: हरेला त्योहार के मनाने से उस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर की संरक्षण और प्रचार-प्रसार होगा।
4. सामाजिक एकता: त्योहार की सामुदायिक भावना से लोगों में मजबूत बंधन बनेगा, जो एकता और सहयोग को प्रोत्साहित करेगा।
समारोह के निर्देश में, हरेला एक सुंदर और अर्थपूर्ण उत्सव है जो मानव-प्रकृति के गहरे संबंध का प्रतीकवाद करता है। इसका संचालन एक आशावादी और समृद्ध भविष्य की ओर एक पॉजिटिव उम्मीद जगाता है।
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